मैने कई समाचारों में देखा और पढ़ा कि ज्ञान देने वाले गुरु ने अपनी शिष्या के साथ गलत संबंध कायम किए, या कोई महिला टीचर ने अपने ही शिष्य के साथ नाजायज संबंध रखे। यहां तक कि हमारी रक्षा करने वाली खाखी भी कई बार दागदार हो चुकी है, लेकिन जब कोई मां अपनी ही कोख से जन्मी बेटी को बहशियों के हवाले कर दे और उसी के सामने उसकी बेटी की आबरू लूटी जाए तो फिर इससे बड़ा कुक्रत्य क्या होगा। सही मायने में देखा जाए तो एक कलयुगी मां भी ऐसा करने से पहले दस बार सोचेगी।
यह घटना आनर किलिंग से संबंधित है। एक मां ने अपनी ही बेटी को महज इतनी गलती के लिए इतनी खौफनाक सचा दी कि उसने अंतर्जातीय विवाह करने की हिमाकत की थी। ये घटना रुडक़ी की है। लक्सर क्षेत्र के गांव केहड़ा में रहने वाले इंद्रेश की आंखे अपनी ही हम उम्र रितु से चार हो गईं। प्रेम का यह सिलसिला पिछले दो वर्षों से चला आ रहा था। दोनों एक दूसरे से जीने-मरने की कसमें खा चुके थे, लेकिन वे शायद यह भूल रहे थे कि उनके इस प्रेम संबंध के बीच उनका परिवार आ जाएगा। क्योंकि इंद्रेश गुज्जर बिरादरी से था और रितु हरिजन समाज से थी। इसलिए उसके परिजनों को यह रिश्ता मंजूर न हुआ और उन पर एक दूसर से न मिलने की पाबंदी लगा दी गई। एक दूसर के साथ जीने मरने की कसमें खा चुके इंद्रेश-रितु का प्रेम ज्यादा दिन कैद में नहीं रह सका और एक दिन मौका पाकर वह प्रेमी युगल फुर्र हो गया। उन्होंने बुलंदशहर जाकर कोर्ट मैरिज की और गाजियाबाद में रहकर नए जीवन की शुरूआत कर दी। वहीं दूसरी ओर गांव में समाज के ठेकेदारों ने पंचायत बुलाकर इंद्रेश की इस हिमाकत पर उसके परिवार को गांव बदर कर दिया और उनकी सारी संपत्ति पर कब्जा जमा लिया। पांच दिन पूर्व 23 नवंबर को इंद्रेश और रितु मोटरसाइकल से लक्सर कोर्ट में पेशी के लिए जा रहे थे। इस बात की भनक रितु के परिजनों को लग गई। उन्होंने घात लगाकर सरेराह दोनों को अगवा कर लिया। इंद्रेश को रितु ने किसी तरह अपने परिजनों के चंगुल से छुड़ाकर पुलिस को बुलाने भेज दिया, लेकिन बदकिस्मती ने उसका साथ न छोड़ा और रितु झूठी शान के लिए अपने ही परिजनों द्वारा गला घोंट कर मार दी गई।
आनर किलिंग के इस सारे घृणित घटनक्रम का सूत्रधार बनी रितु की मां मोहरकली। उसने अपने लडक़े, देवर व अन्य लोगों के साथ मिलकर दोनों के अपहरण के बाद हत्या की साजिश रची। रितु की मां की मौजूदगी में ही पहले उन दरिंदों ने सारे नाते-रिश्तों को ताक पर रख कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया और उसके बाद उसकी बड़ी बेरहमी से हत्या कर शव को उत्तराखंड-यूपी की सीमा से सटे एक खेत में फेंक कर चले गए। रितु की हत्या से पहले उसके बलात्कार की पुष्टि उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट से हुई।
इतना सब होने के बाद भी इस कलयुगी मां (मोहरकली) का जमीर नहीं जागा और वह बार-बार हत्या के इस मामले से अपने आपको अलग बताती रही।
‘पूत कपूत सुना है, लेकिन माता नहीं सुनी कुमाता’ यह पंक्ति हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं। हमारे देश में मां को भगवान से ऊपर का दर्जा दिया गया है। यदि हमारे देश में ऐसी कलयुगी मांओं का जन्म होने लगा और उन्हें उचित दंड नहीं मिला तो आने वाले समय में मां-बाप, बेटा-बेटी और भाई-बहन जैसे रिश्तो की पेवित्रता खत्म हो जाएगी। मेरी राय में ऐसी स्त्री को न्यायालय से ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि आने वाले समय में कोई स्त्री जब ऐसा कुकर्म करने की सोचे तो वह उसे मिलने वाली सजा से कांप उठे और अपने कदम पीछे ले ले।
Sunday, November 28, 2010
Friday, November 26, 2010
अच्छाई पर होवी होती राजनीति
15 अगस्त 1947 में जब भारत आजाद हुआ तब आजादी की लड़ाई लडऩे वाले हमारे पुरोधा इतने खुश थे कि चलो अब हमारी आने वाली पीढ़ी स्वतंत्र भारत में रहेगी। अब उन्हें किसी की गुलामी नहीं करनी पड़ेगी, और न ही कोई अंग्रेज उन्हें सता सकेगा। पर शायद उन लोगों ने यह नहीं सोचा था कि आने वाला भारत भ्रष्टाचार और राजनीति की ऐसी जंजीर में जकड़ जाएगा कि उससे आजादी दिलाना शायद ही मुमकिन हो पाए।
आजादी के समय भी राजनीति थी और आज आजादी के 64 साल बाद भी राजनीति है। पर पहले राजनीति ये थी कि हम किस तरह से अपने देश को दूसर विकसित देशों की श्रेणी में लाएं और आज राजनिति ये है कि किस तरह से दूसर नेता द्वारा किए अच्छे काम को बंद कर दें और अपनी मर्जी चलाएं।
मैं सभी नेताओं के अच्छे कार्यों की महिमामंडन तो यहां नहीं करने जा रहा, लेकिन कुछ ऐसे कार्यों की बात कर रहा हूं जो मेरी नजर में अच्छे थे पर उन्हें बंद कर दिया गया।
मैं बात करूंगा रलेवे से जब लालू यादव रेल मंत्री बने थे तो उन्होंने कई बुरे कार्यों के चलते दो अच्छे कार्य किए थे पहला तो ये था कि उन्होंने गरीब रथ चलाई। इससे मध्यम वर्ग भी एसी में सफर कर सका। दूसरा सबसे बड़ा काम यह कि सभी रलेवे स्टेशनों पर मिट्टी के कुल्हड़ का प्रयोग हुआ। इस आदेश के बाद से हमार देश को कई मायनों लाभ पहुचा। पहला तो यह कि हमार देश में जो मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार थे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया, दूसरा लोगों को शुद्ध बर्तनों में चाय की चुसकी लेने का आनंद मिला और तीसरा सबसे बड़ा लाभ हमारे देश से प्लास्टिक पाल्यूशन कम हुआ। आज रोज विज्ञापनों में लोगों से यह अपील की जाती है कि पालीथिन और प्लास्टिक के बर्तनों का प्रयोग न करें। क्योंकि प्रयोग के बाद ये मिट्टी में दबाने के बाद भी सड़ते गलते नहीं और उल्टे जमीन की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर देते हैं।
लेकिन यहां भी राजनीति होवी हुई ममता दीदी आईं फिर से प्लास्टिक के बर्तनों में चाय दी जाने लगी और कुम्हार फिर से अपनी आर्थिक तंगी से जूझने लगे। आखिर ऐसा क्यों होता है? क्यों नए नेता सत्ता में आने के बाद पुराने नेताओं द्वारा किए अच्छे कामों को नजरंदाज कर देते हैं? क्यों ऐसे कामों पर आवाज नहीं उठाई जाती? मेरी राय में होना तो ये चाहिए कि हमार देश में पालीथिन और यूज एण्ड थ्रो के नाम से पहचानी जाने वाली सभी प्लास्टि के बर्तनों को बनाने वाली कंपनियों को बंद कर देना चाहिए। जो लोग ऐसी चीजों का उपयोग करें उन पर शख्त पाबंदी लागानी चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले समय में हमारे देश की ये हालत हो जाएगी जब पुरातत्व वेत्ता किसी जगह की खुदाई करेंगे तो वहां ऐतिहासिक चीजों की बजाए पालीथिन के ढेर निकलेंगे। हामारे देश की जमीनें बंजर हो चुकेंगी और तब हमरे पास हाथ पर हाथ धरे रहने के अलोवा कोई चारा नहीं बचेगा। इस लेख में मैंने लालू के कार्यों को सिर्फ उदाहरण के तौर लिया है आसलियत में ऐसी हजारों योजनाएं आई जो जनता के लिए काफी लाभप्रद रहीं पर दूसरी सरकार के आते ही उन्हें बंद कर दिया गया।
नोट- इस बार में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं कि इस गंभीर समस्या से मुक्ति के लिए क्या किया जाना चाहिए। आपके जेवाब के इंतजार में आपका मित्र संदीप उपाध्याय, आज समाज दिल्ली
आजादी के समय भी राजनीति थी और आज आजादी के 64 साल बाद भी राजनीति है। पर पहले राजनीति ये थी कि हम किस तरह से अपने देश को दूसर विकसित देशों की श्रेणी में लाएं और आज राजनिति ये है कि किस तरह से दूसर नेता द्वारा किए अच्छे काम को बंद कर दें और अपनी मर्जी चलाएं।
मैं सभी नेताओं के अच्छे कार्यों की महिमामंडन तो यहां नहीं करने जा रहा, लेकिन कुछ ऐसे कार्यों की बात कर रहा हूं जो मेरी नजर में अच्छे थे पर उन्हें बंद कर दिया गया।
मैं बात करूंगा रलेवे से जब लालू यादव रेल मंत्री बने थे तो उन्होंने कई बुरे कार्यों के चलते दो अच्छे कार्य किए थे पहला तो ये था कि उन्होंने गरीब रथ चलाई। इससे मध्यम वर्ग भी एसी में सफर कर सका। दूसरा सबसे बड़ा काम यह कि सभी रलेवे स्टेशनों पर मिट्टी के कुल्हड़ का प्रयोग हुआ। इस आदेश के बाद से हमार देश को कई मायनों लाभ पहुचा। पहला तो यह कि हमार देश में जो मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार थे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया, दूसरा लोगों को शुद्ध बर्तनों में चाय की चुसकी लेने का आनंद मिला और तीसरा सबसे बड़ा लाभ हमारे देश से प्लास्टिक पाल्यूशन कम हुआ। आज रोज विज्ञापनों में लोगों से यह अपील की जाती है कि पालीथिन और प्लास्टिक के बर्तनों का प्रयोग न करें। क्योंकि प्रयोग के बाद ये मिट्टी में दबाने के बाद भी सड़ते गलते नहीं और उल्टे जमीन की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर देते हैं।
लेकिन यहां भी राजनीति होवी हुई ममता दीदी आईं फिर से प्लास्टिक के बर्तनों में चाय दी जाने लगी और कुम्हार फिर से अपनी आर्थिक तंगी से जूझने लगे। आखिर ऐसा क्यों होता है? क्यों नए नेता सत्ता में आने के बाद पुराने नेताओं द्वारा किए अच्छे कामों को नजरंदाज कर देते हैं? क्यों ऐसे कामों पर आवाज नहीं उठाई जाती? मेरी राय में होना तो ये चाहिए कि हमार देश में पालीथिन और यूज एण्ड थ्रो के नाम से पहचानी जाने वाली सभी प्लास्टि के बर्तनों को बनाने वाली कंपनियों को बंद कर देना चाहिए। जो लोग ऐसी चीजों का उपयोग करें उन पर शख्त पाबंदी लागानी चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले समय में हमारे देश की ये हालत हो जाएगी जब पुरातत्व वेत्ता किसी जगह की खुदाई करेंगे तो वहां ऐतिहासिक चीजों की बजाए पालीथिन के ढेर निकलेंगे। हामारे देश की जमीनें बंजर हो चुकेंगी और तब हमरे पास हाथ पर हाथ धरे रहने के अलोवा कोई चारा नहीं बचेगा। इस लेख में मैंने लालू के कार्यों को सिर्फ उदाहरण के तौर लिया है आसलियत में ऐसी हजारों योजनाएं आई जो जनता के लिए काफी लाभप्रद रहीं पर दूसरी सरकार के आते ही उन्हें बंद कर दिया गया।
नोट- इस बार में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं कि इस गंभीर समस्या से मुक्ति के लिए क्या किया जाना चाहिए। आपके जेवाब के इंतजार में आपका मित्र संदीप उपाध्याय, आज समाज दिल्ली
Thursday, November 25, 2010
बिहार में अब तक सत्तासीन मुख्यमंत्री
1. श्रीकृष्ण सिंह : 02 अप्रैल 1946 से 31 जनवरी 1961 तक
2. दीप नारायण सिंह : 01 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961 तक
3. विनोदानंद झा : 18 फरवरी 1961 से 02 अक्टूबर 1963 तक
4. केबी सहाय : 02 अक्टूबर 1963 से 05 मार्च 1967 तक
5. महामाया प्रसाद सिन्हा : 05 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968 तक
6. सतीश प्रसाद सिंह : 28 जनवरी 1968 से 01 फरवरी 1968 तक
7. बीपी मंडल : 01 फरवरी 1968 से 02 मार्च 1968 तक
8. भोला पासवान शास्त्री : 22 मार्च 1968 से 29 जून 1969,
9. हरिहर प्रसाद सिंह : 26 फरवरी 1969 से 22 जून 1969 तक
10. भोला पासवान शास्त्री : 22 जून 1969 से 04 जुलाई 1969
11. दरोगा प्रसाद राय : 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक
12. कर्पूरी ठाकुर : 22 दिसंबर 1970 से 02 जून 1971 तक
13. भोला पासवान शास्त्री : जून 1971 से जनवरी 1972
14. केदार पांडेय : मार्च 1972 से जनवरी 1973
15. अब्दुल गफूर : 02 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक
16. जगन्नाथ मिश्र : 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977
17.कर्पूरी ठाकुर : 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 तक
18.रामसुंदर दास : 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980 तक
19. जगन्नाथ मिश्र : 08 जून 1980 से 14 अगस्त 1983
20. चंद्रशेखर सिंह : 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985 तक
21. बिंदेश्वरी दुबे : 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988 तक
22. भागवत झा आजाद : 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 तक
23. सत्येंद्र नारायण सिन्हा : 11 मार्च 1989 से 06 दिसंबर 1989 तक
24. जगन्नाथ मिश्र : 06 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक
25. लालू प्रसाद यादव : 10 मार्च 1990 से 03 अप्रैल 1995,
26. लालू प्रसाद यादव : 04 अप्रैल 1995 से 25 जुलाई 1997 तक
27. राबड़ी देवी : 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999,
28. राबड़ी देवी : 09 मार्च 1999 से 02 मार्च 2000,
29. नीतीश कुमार : 03 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000
30. राबड़ी देवी : मार्च 2000 से फरवरी 2005
31. नीतीश कुमार : नवंबर 2005 से 24 नवंबर 2010 तक32. नीतीश कुमार : 26 नवंबर से नए मुख्यमंत्री पद की शपथ
Wednesday, November 24, 2010
लालू जी अब कौन भागेगा मीडिया या आप
अखिर छह चरणों की लंबी प्रक्रिया के बाद २४३ विधानसभा क्षेत्रों में हुए बिहार विधानसभा चुनोवों के परिणाम २४ नवंबर को आ ही गए। पर सबसे मजेदार बात यह रही कि यह चुनाव एग्जिट पोल के अनुरूप और हर जगह चुटकी लेने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव सिर्फ चुटकी ही लेते रह गए और शुक्रवार २६ नवंबर को नीतीश सरकार दुबारा सत्तासीन होने जा रही है।
सही मायने में देखा जाए तो बिहार विधानसभा चुनाव वाकयी मजेदार रहा। इन चुनाव में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की चली और नहीं राजद-लोजपा गठबंधन की। इस चुनोव में जहां कांग्रेस को अच्छी बढ़त की उम्मीद थी और वह अकेले दम पर बिहार में पिछली बार ज्यादा सीटें पाने की उम्मीद कर रही थी, मगर अफसोस कि उन्हें सिर्फ चार सीटों से संतोष करना पड़ा और सोनिया सहित कांग्रेसे बाकी वरिष्ठ नेता तीतीश कुमार को बधाई देते नजर आ रहे हैं।
वहीं दूसरी तरफ राजद-लोजपा गठबंधन की स्थिति इतनी दयनीय हो गई कि उन्हें सिर्फ 27 सीटों से संतोष करना पडा राजद सुप्रीमों लालू यादेव की पत्नी राबड़ी देवी को सोनपुर सहित अपने दोनों विधानसभा सीटों में मूकी खानी पड़ी। लोजपा सुप्रीमों रामेविलास पासवान के दोनों भाई इस चुनावी संग्राम में कुछ खाश नहीं कर पाए।
चुनाव परिणाम के पहले तक राजद सुप्रीमों लालू यादव जगह-जगह प्रेस कांफ्रेंस करके यह कहते फिर रहे थे कि इस बार वह बिहार में दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्तासीन होंगे। उन्होंने मीडिया पर पलटवार करते हुए कहा कि मीडिया चैनलों सहित तमाम सर्वे एजेंसियों ने जो चुनाव का सर्वेक्षण दिया है वह गलत है और परिणाम आने के बाद लालू की कथनी पूरी तरह से सही होगी तथा मीडिया चैनल जनता की नजरों से भागते नजर आएंगे। लेकिन २४ नवंबर को देखने वाली बात यह रही कि जी, स्टार, एनडीटीवी तथा इंडिया न्यूज जैसे तमाम न्यूज चैनल तो दम भरते नजर आए कि उनका आकलन कितना सही था, पर समाचारों में लालू नहीं नजर आए। लगता है कि लालू शर्म के मारे अपनी मांद में घुस गए हैं। शायद लालू यही सोच रहे होंगे कि वह जनता व मीडिया को क्या जवाब देंगे कि जब उनकी पत्नी ही दो-दो जगह से खड़े होने के बावजूद हार गईं तो फिर अन्य पार्टी प्रत्याशियों का क्या?
सही मायने में देखा जाए तो बिहार विधानसभा चुनाव वाकयी मजेदार रहा। इन चुनाव में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की चली और नहीं राजद-लोजपा गठबंधन की। इस चुनोव में जहां कांग्रेस को अच्छी बढ़त की उम्मीद थी और वह अकेले दम पर बिहार में पिछली बार ज्यादा सीटें पाने की उम्मीद कर रही थी, मगर अफसोस कि उन्हें सिर्फ चार सीटों से संतोष करना पड़ा और सोनिया सहित कांग्रेसे बाकी वरिष्ठ नेता तीतीश कुमार को बधाई देते नजर आ रहे हैं।
वहीं दूसरी तरफ राजद-लोजपा गठबंधन की स्थिति इतनी दयनीय हो गई कि उन्हें सिर्फ 27 सीटों से संतोष करना पडा राजद सुप्रीमों लालू यादेव की पत्नी राबड़ी देवी को सोनपुर सहित अपने दोनों विधानसभा सीटों में मूकी खानी पड़ी। लोजपा सुप्रीमों रामेविलास पासवान के दोनों भाई इस चुनावी संग्राम में कुछ खाश नहीं कर पाए।
चुनाव परिणाम के पहले तक राजद सुप्रीमों लालू यादव जगह-जगह प्रेस कांफ्रेंस करके यह कहते फिर रहे थे कि इस बार वह बिहार में दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्तासीन होंगे। उन्होंने मीडिया पर पलटवार करते हुए कहा कि मीडिया चैनलों सहित तमाम सर्वे एजेंसियों ने जो चुनाव का सर्वेक्षण दिया है वह गलत है और परिणाम आने के बाद लालू की कथनी पूरी तरह से सही होगी तथा मीडिया चैनल जनता की नजरों से भागते नजर आएंगे। लेकिन २४ नवंबर को देखने वाली बात यह रही कि जी, स्टार, एनडीटीवी तथा इंडिया न्यूज जैसे तमाम न्यूज चैनल तो दम भरते नजर आए कि उनका आकलन कितना सही था, पर समाचारों में लालू नहीं नजर आए। लगता है कि लालू शर्म के मारे अपनी मांद में घुस गए हैं। शायद लालू यही सोच रहे होंगे कि वह जनता व मीडिया को क्या जवाब देंगे कि जब उनकी पत्नी ही दो-दो जगह से खड़े होने के बावजूद हार गईं तो फिर अन्य पार्टी प्रत्याशियों का क्या?
Subscribe to:
Posts (Atom)
